वो अँधेरी रात की चाप थी
जो गुज़र गई
कभी खिड़कियों पेन झक सकी
किसी रास्ते में न रुक सकी
उसे जाने किस की तलाश थी
मिरी आँख ओस से तर रही है
मुझे ख्वाब बनने की लत रही
कभी एक सूनी सी रहगुजरपेखड़ा था में
कभी दूर रेल की पटरियों पे पड़ा था मैं
वो किसी के जिस्म की चाप थी
जो गुज़र गई
उसे जाने किसकी तलाश थी
मिरे दिल के दश्त की रेत ही में खिली थी वो
मुझे इकगली में मिली थीवो
उसे मुझसे शौक़ - ए - विसाल था
मिरे ख्वाब मुझ से खफ़ा हुए
मुझे नींद आई में सो गया
यही रतजगों का ज़वाल था

पतझण था मगर फिर भी . . .
दूर दरख्त की शाख में
एक हरा पत्ता दिखाई पड़ता था ।
मैं रोज़ बहुत देर तक
उस अकेले पत्ते को निहारता रहता ।
दरख्त के मजूबे इश्क में मदहोश ,
मुस्कुराता हुआ सा वो पत्ता ,
मौसमी हवा को जैसे रोज़
मुँह चिड़ाता था ।
इक रोज़ यकायक दरख्त की शाख से टूटकर
बरामदे में गिर आया ।
उस नाज़ुक से पत्ते को सम्भालकर
मैंने अपनी डायरी के बीच महफूज़ कर लिया ।
एक दिन डायरी खोली तो देखा ,
वो मुस्कुराता हुआ सा पत्ता
अब बदल गया है , वो रूमानियत नहीं रही
जो दरख्त के आगोश में दिखाई देती थी ।
शायद लोग सच ही कहते हैं ।
तुमसे दूर होकर मैं बदल गया हूँ ।
मैं खुद भी सोचता हूँ . . .
मैं खुद भी सोचता हूँ ये क्या मेरा हाल है ।
जिसका जवाब चाहिए , वो क्या सवाल है ;
घर से चला तो दिल के सिवा पास कुछ न था ;
क्या मुझसे खो गया है , मुझे क्या मलाल है ;
आसूदगी से दिल के सभी दाग धुल गए ;
लेकिन वो कैसे जाए , जो शीशे में बल है ;
बे - दस्तो - पा हू आज तो इल्जाम किसको दूँ
कल मैंने ही बुना था , ये मेरा ही जाल है ;
फिर कोई ख्वाब देखू , कोई आरजू करूँ ;
अब ऐ दिल - ए - तबाह , तेरा क्या ख्याल है ।
तू अकेले क्यों गई
तू अकेले क्यों गयी ,
अपनी याद को भी ले जाती ।
जो गुज़ारे थे साथ हर पल ,
एक - एक पल को ले जाती ।
मेरे होठों की मुस्कान ,
और मेरी खुशी दे जाती ,
अपने काजल और लिपस्टिक भी ले जाती ,
मेरी तस्वीर और मेरे ख़त ,
मुझे वापस लौटा जाती , और
अपनी पायलों की छम - छम ,
और झुमकों की खन - खन भी ले जाती ।
अपना नाम , अपनी खुशबू , अपने बदन ,
तू अपने रग - रग को ले जाती ।
ऐ ज़ालिम , तू मुझको ही ले जाती ।
तू अकेले क्यों गयी ,
अपनी याद को भी ले जाती । । 

एक दिन हमजदा होजायेगे ,
नजाने कहाँखोजायेंगे ,
तुम लाख पुकारोगे हमको ,
परलोट केहमन आयेगे
थक - हार के दिन के कामों से
जब रात को सोने जाओगे ,
देखोगे जब तुम फोन को .
पैगाम मेरान पाओगे .
सब याद तुम्हे हम आयेगे
परलौट के हम न आयेगे . .
इक रोज ये रिश्ता टूटेगा .
दिल इतना ज्यादा टूटेगा ,
फिर कोई नहमसे रूठेगा ,
हमन ऑखेखोलेंगे
तुमसे कभीन बोलेंगे ,
आखिर उस दिनतम रोदोगे .
ऐदोस्ततम मुझेोदोगे . . . " 
अगर कभी हम मिले तो उस वक़्त भी
मेरी ठहरी हुई इन आँखों में ,
मुस्करा रही होगी तुम्हारी मुहब्बत
तुम्हें जीतने के लिए
मैंने कोई बाजी नहीं खेली थी
अपने आप ही रख दी थी
सारी की सारी नज़मे तुम्हारे सामने
मुहब्बत तो हारने का नाम है . . . .
अमृता प्रीतम . 

हमें रखना था अपना प्रेम छुपाकर
हर उस नज़र से
जो लगाती है नज़र
प्रेम पक्षियों पर
हमने सहेज कर रखा
अपने अहसास को , विश्वास को
सृष्टि की आँखों से भी रखा ओझल
कि पलट ना जाए ग्रह नक्षत्रों की स्थिति
मगर नज़र से बचाते हुए
लग जाती है नज़र फिर भी
सो लग गई इस रिश्ते को
हमारी ही नज़र
क्यूंकी हम भूल गए थे
इसे एकदूजे से छुपाना ।
- Swarima Tewari

हाथ खाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते
अब के मायूस हुआ यारों को रुख्सत कर के
जा रहे थे तो कोई ज़लम लगाते जाते
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते जात
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था
तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते
मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते
हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते 

मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा - सा इक आम का पेड़ कभी ?
मेरा वाकिफ है बहुत सालों से , मैं जानता हूँ
जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस भाख से मेरा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर
मेरी शादी पे मुझे याद है पाखें देकर
मेरी वेदी का हवन गरम किया था उसने
और जब हामला बी बीवा , तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ़ कैरियाँ फेंकी थी उसी ने
वक़्त के साथ सभी फूल , सभी पत्ते गए
तब भी लजाता था जब मुन्ने से कहती बीवा
' हाँ उसी पेड़ से आया है तू , पेड़ का फल है । '
अव भी लजाता हूँ , जव मोड़ से गुजरता हूँ
खाँस कर कहता है , क्यू , सर के सभी बाल गए ? "
सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको !

कही कही से हर चेहरा तुम जैसा लगता है
तुमको भूल न
पाएंगे हम ऐसा लगता है
ऐसा भी एक रंग है जो करता है ।
बाते भी
जो भी इसको पहन ले वो अपना सा लगता है
तुम
क्या बिछड़े भूल गए रिश्तो की शराफत हम
जो भी मिलता है
कुछ दिन ही अच्छा लगता है ।
अब भी यूं मिलते है हमसे फूल
चमेली के
जैसे इनसे अपना कोई रिश्ता लगता है
और तो सब
कुछ ठीक है लेकिन कभी कभी यूं ही
चलता फिरता शहर अचानक
तन्हा लगता है
( निदा फ़ाज़ली ) 

Jab jab dard ka baadal chaya
Jab ghum ka saya lehraya
Jab aansoo palkon tak aya
Jab yeh tanha dil ghabraya
Humne dil ko yeh samjhaya
Dil aakhir tu kyun rota hai
19 Duniya mein yunhi hota hai
Yeh jo gehre sannate hain
Waqt ne sabko hi baante hain
Thoda ghum hai sabka qissa
Thodi dhoop hai sabka hissa
Aankh teri bekaar hi nam hai
Har pal ek naya mausam hai
Kyun tu aise pal khota hai
Dil aakhir tu kyun rota hai